गोपाल मुखर्जी - विभाजन के दौरान बंगाल के हिंदुओं का रक्षक

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गोपाल चंद्र मुखोपाध्याय उर्फ़ गोपाल पाठा उर्फ़ गोपाल मुखर्जी  ??

गोपाल पाठा सेंट्रल कलकत्ता के बोवबाजार में मलंगा लेन में रहते थे। उसके पास एक बूचड़खाने भी था और इसलिए वह गोपाल पन्था के नाम से अधिक प्रसिद्ध था। हालाँकि, इन सब के बावजूद उनकी देशभक्ति किसी से पीछे नहीं थी। वह अनुकुल चंद्र मुखर्जी (प्रसिद्ध क्रांतिकारी) और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के अनुयायी थे। उन्हें अहिंसा के अजीब सिद्धांत पर भरोसा नहीं था और गांधी द्वारा भारतीय परिदृश्य में भी प्रचारित किया गया था। गोपाल का दृढ़ विश्वास था कि भारत से अंग्रेजों को भगाने के लिए बल सबसे आवश्यक विशेषता है। निजी तौर पर कांग्रेस के कुछ नेताओं के साथ उनके अच्छे संबंध थे,

Gopal Mukherjee
Gopal Patha or Gopal Mukherjee

इनका नाम शायद ही आपको भारत के किसी भी कम्युनिस्ट इतिहास में मिलेगा ,

गोपाल मुखर्जी अपनी विचारधारा के आधार पर, भारतीय जाति बाहिनी नाम के एक छोटे से संगठन का गठन और संचालन करते थे - हिंदू युवा शक्ति और हथियारों के ज्ञान को जानने और अभ्यास करने के लिए इस्तेमाल करते थे। भले ही लोग इसके प्रति सचेत नहीं थे, लेकिन उसी संगठन ने अगस्त, 1946 में पहली हिंदू रक्षा की। उनके शिष्यों ने मुस्लिम उपद्रवियों पर काबू पाने में सफलता हासिल की और गोपाल को हिंदुओं का उद्धारकर्ता कहा गया।

 डायरेक्ट एक्शन डे के दिन इन्होने जब देखा की बंगाल के चारो ओर हिन्दू मारे जा रहे है , कोई इनको रोकने वाला नही है फिर इन्होने अपने कुछ मित्रो के साथ एक टीम बनायीं और हथियार इकठ्ठे किये , बम बारूद जैसे जरुरी सामान को इकठ्ठा किया , दंगाइयों को सबक सिखाने निकल पड़ा।

गोपाल के कारण मुस्लिम दंगाइयों में दहशत फैल गई और जब हिन्दुओ का पलड़ा भारी होने लगा तो हुसैन शहीद सुहरावर्दीने सेना बुला ली। तब जाकर दंगे रुके। लेकिन गोपाल ने कोलकाता को बर्बाद होने से बचा लिया।

गोपाल के इस "कारनामे" के बाद गाँधी ने कोलकाता आकर अनशन प्रारम्भ कर दिया (क्योंकि उनके प्यारे मुसलमान ठुकने लगे थे)। उन्होंने खुद गोपाल को दो बार बुलाया, लेकिन गोपाल ने स्पष्ट मना कर दिया।

तीसरी बार जब एक कांग्रेस के स्थानीय नेता ने गोपाल से प्रार्थना की “कम से कम कुछ हथियार तो गाँधी जी सामने डाल दो”। तब गोपाल ने कहा कि “जब हिन्दुओ की हत्या हो रही थी, तब तुम्हारे गाँधीजी कहाँ थे? मैंने इन हथियारों से अपने इलाके की हिन्दू महिलाओ की रक्षा की है, मैं हथियार नहीं डालूँगा।

अगर सही मायने में कहा जाये हम इस हिदुओ के रक्षक को भूल गये. और हम आज भी गाँधी के झूठी धर्मनिरपेक्षता के गुलाम है. शायद हमें इन जैसे नायको को नही भूलना चाहिए।।




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