भागवत कथा के नाम पर "मौला अली" गा रहे है कथावाचक, राम की जगह 'अल्लाह'

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पिछले कुछ समय में ऐसे कथावाचकों के ढेरों वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं जो रामकथा के नाम पर इस्लाम या ईसाईयत की शिक्षा दे रहे हैं। चूंकि इन्होंने हिंदू धर्म के कथावाचक के तौर पर बरसों से अपनी पहचान बनाई है इसलिए लोग उनकी बातों को मानते भी हैं।

मशहूर राम कथावाचक मोरारी बापू तो बाकायदा राम की जगह 'अली मौला' , 'अली मौला'; का जाप कराते देखे जा सकते हैं। इसी तरह कई जगह भागवत कथाओं में नमाज पढ़ने के फायदे और यहां तक कि भौंडा नाच-गाना भी शुरू हो चुका है। शक जताया जा रहा है कि कथावाचकों की शक्ल में हिंदुओं के बीच बड़ी संख्या में ऐसे तत्व घुसाए गए हैं जो लोगों के बीच एक खास तरह की राय बनाने में जुटे हैं। साथ ही लड़कियों और नाचगाने का भी इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि युवाओं को खींचा जा सके।

मोरारीबापू के प्रवचनों में सेकुलर पाठ

रामकथाओं में इस्लाम के बारे में शिक्षा देने का यह चलन पहले मोरारी बापू ने किया। पिछले कुछ साल से वो यह काम कर रहे थे। शुरू में लोगों ने इसे बहुत गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन अब यह उनका नियमित काम बन गया है। कई बार तो वो काफी देर तक अली मौला-अली मौला पर ही अटके रहते हैं। वो कहते हैं कि यह उनके अंदर से निकलता है और अल्लाह उनसे बुलवाते हैं। उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है, जिसमें वो मुहम्मद की करुणा के बारे में बता रहे हैं।

देवी चित्रलेखा से चिन्मयानंद बापू तक

समस्या सिर्फ़ मोरारी बापू तक नहीं है। बीते कुछ साल में ढेरों रहस्यमय कथावाचक पैदा हुए हैं, जो भागवत और राम कथा के नाम पर इस्लाम और ईसाई धर्म की शिक्षा बाँट रहे हैं। उनके प्रवचनों में जाने वाले सौ फ़ीसदी लोग हिंदू ही होते हैं तो वहाँ पर मोहम्मद साहब या ईसा मसीह की महानता के बारे में बताने या नमाज़ पढ़ने की शिक्षा देने का मतलब समझ नहीं आता। हरियाणा के पलवल की एक देवी चित्रलेखा नाम की कथावाचिका हैं, जिनके कई वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में हैं। चित्रलेखा के फ़ेसबुक पर 20 लाख से ज़्यादा फ़ॉलोअर हैं और उनके प्रवचनों में भारी भीड़ जुटती है। वो अपने प्रवचनों में जो ज्ञान देती हैं उसका असर पहली नज़र में पकड़ना आसान नहीं होगा। वो बताती हैं कि सारे धर्म एक जैसे हैं। अगर हम मुसलमानों की नमाज़ का सम्मान कर लेंगे तो क्या हो जाएगा। 

मिलावट से नाराज़ साधु-संत

रामकथा प्रवचनों में इस्लाम और ईसाईयत की मिलावट से संत समाज भी दुखी है। कई साधु-संतों ने खुलकर इसका विरोध किया है। यहाँ यह जानना ज़रूरी है कि कथावाचक कोई हिंदू धर्म के ज्ञानी या सिद्धपुरुष नहीं होते। वो सिर्फ़ कहानियाँ सुनाने के लिए होते हैं ताकि लोगों में धर्म के लिए जागृति पैदा की जा सके। लेकिन कुछ कथावाचकों ने आडंबर की सारी हदें तोड़ दीं।




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